[] नज़्म : 14 – आशिक़ी

तू जवाॅं है कुछ नहीं तो आशिक़ी कर डालना ।। जान जो ले बस उसी को ज़िंदगी कर डालना ।‌। प्यार करना जिस किसी को हद से तू जाना गुज़र , दिल नहीं बस तू तो उसकी रूह में जाना...Read more

मुक्तक : 1053 – सोच

उसके बग़ैर ज़िंदगी के पाॅंव कट गए , ख़्वाबों के पर उड़ान से ही पेशतर जले ।। साॅंसें चले हैं या कि तेज़ ऑंधियाॅं चलें , चलता हूॅं तो लगे चिता से लाश उठ चले ।। पल काटना है जब...Read more

ऑंखें

 प्रायः स्थायी चश्मिश जब कभी अपना ऐनक उतारते हैं तो उनके हिरननयन भी हस्तिचक्षु भासित नहीं होते अपितु हो ही जाते हैं । हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा । तस्वीर कटिंग कराने के पश्चात्...Read more

मुक्तक : 1052 – सुअर

दुखती हैं एड़ियाॅं औ’ तिस पे मोच पाॅंव में , चलता हूॅं जोंक-केंचुओं सा साल भर से सच ।। देखूॅं मैं चौंक -चौंक टकटकी लगा पड़ा , लॅंगड़े भी बढ़ रहे उधर उचक इधर से सच ।। दुनिया में सब...Read more

स्वप्न

मैंने कुछ शेर शौक़ से अपने , घर के ऑंगन में पाल रक्खे हैं , जिनको ले जाके मैं चरोखर में , घास पत्ती हरी चराता हूॅं ।। अपनी गायों को तुपनी भैंसों को , चंट बकरी को लंठ भेड़ों...Read more

मुक्तक : 1052 – ढब

दरख़्तों के साए में दुनिया से छुपकर मैं कब से खड़ा हूॅं ? निगाहें झुका सिर झुका बंदगी से अदब से खड़ा हूॅं ।। वो दे देंगे आकर ख़ताओं पे मेरी मुआफ़ी मुझे बस , यही सोचकर इस क़रीने से...Read more