■ मुक्तक : 1005 – जला डाला

इक हिमालय को सबने मिलके अपनी ताक़त से , जा से सरकाने ज़ोर-ज़ोर से हला डाला ।। सख़्त पत्थर सा बर्फ़ आफ़्ताब से मिलकर , देखते-देखते ही मोम सा गला डाला ।। सबही आए थे सोचकर गुनाह करने को ;...Read more

[] नज़्म : 3 – फ़र्ज़

नहीं चाहता जिनकी सूरत भी देखूँ , उन्हीं के है दीदार का हुक़्म मुझको !! जिन्हें चाहता हूँ कि बस मार डालूँ ; मगर उनसे ही प्यार का हुक़्म मुझको !! तुम्हें क्या पता क्यों मैं जाता उधर हूँ ?...Read more

[] नज़्म : 2 – काला बंदर

मैं इक फूल की नर्म सी पंखुड़ी था , वो बिच्छू के डंकों सा बेरी का काँटा ।। चपत था मैं इक प्यार की गाल पर वो , बहुत ज़ोर का एक मुक्के सा चाँटा ।। मैं सचमुच शहद या...Read more

■ मुक्तक : 1004 – नाग

राम रटता मत हरा तोता सही , काँव करता एक काला काग रख ।। एक चितकबरी सी बिल्ली गोद ले , या भले कुत्ता कोई बेदाग़ रख ।। गाय यदि ना मिल सके तो इक सुअर ; पाल ले कैसा...Read more

■ मुक्तक : 1003 – बदल रहा हूँ मैं

नहीं कोई चिराग़ वर्ना आँधियों में क्यों , भले ही फड़फड़ा के फिर भी जल रहा हूँ मैं ? कटे नहीं है मेरे पैर तब तो काँटों पे , पहन के जूते ख़ूब तेज़ चल रहा हूँ मैं ।। मैं...Read more

■ मुक्तक : 1002 – तमन्ना

मुझको उसने न सिर्फ़ आँखों में जगह दी थी , बल्कि दिल में भी चंद रोज़ को बसाया था ।। उसको बेशक़ कभी न मेरी थी तमन्ना पर , मैंने बढ़चढ़ उसी के ख़्वाबों को सजाया था ।। हो रहा...Read more