प्रतीक्षा

छिपकली की कभी तो कटी पूॅंछ सा , तो कभी ज़िंदा फन कुचले इक साॅंप सा , कुछ घड़ी को नमक में गिरी जोंक सा , कुछ पहर रेत पर नीर बिन मीन सा ; लौट कर मुझसे आने की...Read more

∆ ग़ज़ल : 308 – किर्दार

लाश का किर्दार यूॅं मैंने निभाया ।। मुझको सब ने मिलके ज़िंदा जा गड़ाया ।। धूप में रोटी पकाऊॅं क्योंकि सबने , जब जलाया मैंने चूल्हा आ बुझाया ।। उससे शादी हो नहीं सकती थी तब ही , उस हसीना...Read more

मुक्तक : 1045 – क्यों ?

ये मेरा दिल जो है पत्थर का खुश्क़ ऑंखों से , पिघल-पिघल के निकलता ही हाय ! जाए क्यों ? बिछुड़ते वक़्त भी रोया न था जो इक ऑंसू , वो आठ-आठ बड़े अश्क़ आज ढाए क्यों ? बहुत दिनों...Read more

मुक्तक : 1044 – बदला

बद्दुआ निकले है मेरे दिल से ये ही आजकल ; इश्क़ में लग जाए ऐसी आग वो बस जाए जल ।। कोयला उसने मुझे हीरे से करके रख दिया , मैं भी चाहूॅं वो भी ज़र से जाए मिट्टी में...Read more

मुक्तक : 1043 – पलटा

जाने क्या हासिल हुआ या खो गया या छिन गया , तर्ज़ो अंदाज़ आजकल सब खा गया पलटा मेरा ? पाॅंवों से करता हूॅं अपने सब के सब ही काम मैं , कारवाॅं दिन-रात अनथक हाथों से चलता मेरा ।।...Read more

मुक्तक : 1042 – क्यों ?

गंगा की धार में कुछेक मोड़-माड़कर , मुट्ठी में दाबे तैरकर बहाने को चला ।। जलती चिता में बच गए वो फाड़-फूड़कर , थैले में रख दबा-छुपा जलाने को चला ।। जाॅं से कहीं ज़ियादा जो सॅंभाल कर रखे ;...Read more