■ मुक्तक : 989 – क्यों ?

तुम क्यों ये चाहते हो ,ठीक उनके कान में जा , खाई को गिरि ,रसातल ,को तूल बोल दूँ मैं ? संसार भर के आगे ,किस रौ में बह अकारण , मझधार को नदी की ,थिर कूल बोल दूँ मैं...Read more

■ मुक्तक : 988 – इंतिज़ार

सब पूछना मगर न पूछना ये भूलकर सवाल ।। क्या है तुम्हारे बिन हमारा इन दिनों में हालचाल ? वर्ना तुम्हें जवाब कैसे देंगे ये कि हम को डर है , फ़रमा न जाएँ इंतिज़ार में कहीं हम इंतिक़ाल ?...Read more

■ मुक्तक : 987 – दौर-ए-बेरोज़गारी

बेरोज़गारियों का , कैसा ये दौर ऊँची- तालीम लेके वाजिब , मिलता न काम कोई ? इंजीनियर लगाते , ले-ले के ठेला फेरी , चिल्लाते ले लो आलू , भिंडी-धना-तरोई !! कैसा है रे ज़माना , पेट अपना पालने को...Read more

■ मुक्तक : 986 – ख़्वाब

कहते हैं लोग सूरत , यों है करीह मेरी , तकते ही मुझको उनको , आ जाएँ मितलियाँ ही ।। करते हैं बात मुझसे , ऐसे कि जैसे कोई , दे दर खड़े भिखारी , को तल्ख़ झिड़कियाँ सी ।।...Read more

■ मुक्तक : 985 – बातें

कट चुके हाथों से बातें , हो रहीं हैं , सच यही है ।। थक गए पावों से बातें , हो रहीं हैं , सच यही है ।। काटकर जबसे जुबाँ रख , दी गई है , ताक पर बस...Read more

■ मुक्तक : 984 – इल्तिजा

मछली सा तैरूँ बाज़ों , सा उड़ दिखाऊँ उनको , बन जाऊँ केंचुआ या , इक कामयाब ग़ाज़ी ।। सच कह रहा हूँ चाहे , जिसकी क़सम खिला लो , मैं जीत कर बता दूँ , हारी हर एक बाज़ी...Read more