मुक्तक : 961 – मृत्यु दो

एक ही अपने ग़म का है चारा सुनो , जो बची हैं वो साँसें उखाड़ो अभी ।। ज़हर भी खा के मैं साफ़ बच जाऊँ जो , तो ज़मीं में गढ़ा खोद गाड़ो अभी ।। जिस्म बेशक़ लगे ख़ूबसूरत मेरा...Read more

मुक्तक : 960 – ख़त

क्या है वो , कैसी है वो , तारीफ़ में उसकी , हर कभी कब एकदम से ख़त उसे लिखता ? हर कहीं पर बैठ भी कब जल्दबाज़ी में , कब तकल्लुफ़ को क़सम से ख़त उसे लिखता ? दिल...Read more

मुक्तक : 959 – वापसी

महब्बत के अपने शिकंजे में कस वो , कभी करने आज़ाद हरगिज़ न आए ।। मैं लौटूँगा कहकर कई साल पहले , जो जाने के फिर बाद हरगिज़ न आए ।। उन्हें इस क़दर रफ़्ता – रफ़्ता बमुश्किल , भुलाते...Read more

मुक्तक : 958 – गोवा

फ़ाख़्ताएँ मिलीं , बुलबुलें अनगिनत , था ज़रूरी बस इक राज-सारस हमें ।। ज़र ख़ुमों के ज़ख़ीरों की थी कब तलब , लाज़िमी था फ़क़त एक पारस हमें ।। इस क़दर अपनी क़िस्मत के थे दास हम । शेर थे...Read more

मुक्तक : 957 – ज़िंदा बने रहे

आँखों को लग गए थे , कुछ इस क़दर वो अच्छे , मरने तलक भी दिल में , ज़िंदा बने रहे थे ।। हम जितनी गर्मजोशी , से पेश आए उनसे , उतना वो हमसे मिलते , वक़्त अनमने रहे...Read more

मुक्तक : 956 – होश

यूँ ही हमें न पागल , सब लोग-बाग कहते ।। बिन उज्र गालियाँ जो , चुपचाप रोज़ सहते ।। इक बात और दुनिया , मै पीके लड़खड़ाती , पीते नहीं हैं जब तक , हम होश में न रहते ।।...Read more