■ मुक्तक : 986 – ख़्वाब

कहते हैं लोग सूरत , यों है करीह मेरी , तकते ही मुझको उनको , आ जाएँ मितलियाँ ही ।। करते हैं बात मुझसे , ऐसे कि जैसे कोई , दे दर खड़े भिखारी , को तल्ख़ झिड़कियाँ सी ।।...Read more

■ मुक्तक : 985 – बातें

कट चुके हाथों से बातें , हो रहीं हैं , सच यही है ।। थक गए पावों से बातें , हो रहीं हैं , सच यही है ।। काटकर जबसे जुबाँ रख , दी गई है , ताक पर बस...Read more

■ मुक्तक : 984 – इल्तिजा

मछली सा तैरूँ बाज़ों , सा उड़ दिखाऊँ उनको , बन जाऊँ केंचुआ या , इक कामयाब ग़ाज़ी ।। सच कह रहा हूँ चाहे , जिसकी क़सम खिला लो , मैं जीत कर बता दूँ , हारी हर एक बाज़ी...Read more

■ मुक्तक : 983 – रवैया

होकर मैं फ़िक्रमंद तो , रोता नहीं कभी , आलम हो दिल में जब खुशी , का फूट रोऊँ मैं ।। तूफ़ान जब भी आए तो , घोड़े मैं बेचकर , चादर को लंबी तान भर , खर्राटे सोऊँ मैं...Read more

■ मुक्तक : 982 – ख़्वाहिश

सावन में झूला झूल ज्यों , उठाएँ लुत्फ़ लड़कियाँ , उससे कहीं ज़ियादा ही , उठा रहे हैं वो मज़ा ।। जानूँ न किस बिना पे पर , सुना-सुना के रात-दिन , छोटी से छोटी बात पर , कड़ी से...Read more

■ मुक्तक : 981 – नज़ारा

तेरे हुस्न का करके सिर्फ़ इक नज़ारा , फँसा था न मैं इश्क़ के जाल में जब ।। न मालूम था मुझको ग़म चीज़ क्या है ? न हरगिज़ था रिश्ता मेरा दर्द से तब ।। कि एक वक़्त था...Read more