■ मुक्तक : 993 – घोर आश्चर्य !

वो मेरे लिए क्यों तड़पता नहीं है ? क्यों मिलने को इक पल न बेचैन होता ? चलो माना हँसता है महफ़िल में हरदम , तो तनहाई में भी कभी क्यों न रोता ? मुझे चाँद अपना जो कहते न...Read more

■ मुक्तक : 992 – बुरी आदतें

करूँ क्या मैं ? लेकिन ये सच है शुरू से , बुरी सुह्बतें मुझको लगतीं हैं अच्छी ।। न हरगिज़ जिन्हें चाहे करना ज़माना , वो सब हरक़तें मुझको लगतीं हैं अच्छी ।। सभी की पसंदों का दर्जा है आला...Read more

● ग़ज़ल : 292 – आख़िरी तमन्ना

वो बेदिली से मुझको , दिल से लगे हटाने ।। मैं भी न चाह कर भी , उनको जुटा भुलाने ।। मैं साँप हौले-हौले , बनता नया-नया सा , तेज़ी से हो रहे हैं , वो नेवले पुराने ।। तैयार...Read more

■ मुक्तक : 991 – उलटी बातें

सिर पे न उसके कोई , दिखता पहाड़ लेकिन , कहता है बोझ भारी मैं रोज़ ढो रहा हूँ !! आँसू कभी लुढ़कते , गालों पे उसके कब पर , हँस-हँस के बोलता है , दिन-रात रो रहा हूँ ।।...Read more

■ मुक्तक : 990 – गुनाह

कैसा गुनाह हमसे , ये आज हो गया रे ? बोतल का वो हलाहिल , हमने दवा बताया ।। नुक़सान के सिवा जो , कुछ भी नहीं था उसको , हमने बड़े यक़ीं से , ख़ालिस नफ़ा बताया !! इस...Read more

■ मुक्तक : 989 – क्यों ?

तुम क्यों ये चाहते हो ,ठीक उनके कान में जा , खाई को गिरि ,रसातल ,को तूल बोल दूँ मैं ? संसार भर के आगे ,किस रौ में बह अकारण , मझधार को नदी की ,थिर कूल बोल दूँ मैं...Read more