मुक्तक : 432 – रिश्ता हो कोई ठोंक

रिश्ता हो कोई ठोंक बजाकर बनाइये ।। शादी तो लाख बार सोचकर रचाइये ।। अंजाम कितने ही है निगाहों के सामने , झूठी क़शिश को इश्क़ो मोहब्बत न जानिये ।। –डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 433 – जानवर को बहुत

जानवर को बहुत प्यार करता जहाँ ।। पेड़ पौधों पे भी दुनिया देती है जाँ ।। दूरियाँ होशियारी से क़ायम रखे , इंसाँ इंसाँ से बचता फिरे याँ वहाँ ।।  -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 431 – बचपन में ही इश्क़

बचपन में ही इश्क़ ने उसको यों जकड़ा ।। है चौदह का मगर तीस से लगे बड़ा ।। जिससे दोनों हाथ से लोटा तक न उठे , वो प्याले सा एक हाथ से उठाए घड़ा ।। –डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 430 – सबपे पहले ही से

सबपे पहले ही से बोझे थे बेशुमार यहाँ ।। अश्क़ टपकाने लगते सब थे बेक़रार यहाँ ।। सोचते थे कि होता अपना भी इक दिल ख़ुशकुन लेकिन ऐसा न मिला हमको ग़मगुसार यहाँ ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 428 – ज्यों आँखें मलते उठते हो

ज्यों आँखें मलते उठते हो यों ही भीतर से जागो तुम ।। मैं आईना हूँ अपने सच से मत बचकर के भागो तुम ।। क़सीदे से कहीं उम्दा लगे ऐसी रफ़ू मारो , फटे दामन को कथरी की तरह मत हाय तागो तुम ।। -डॉ....Read more

मुक्तक : 429 – तक्लीफ़ो-ग़म-अलम से

तक्लीफ़ो-ग़म-अलम से , शादमानियों से क्या ? बेलौस-कामयाबियों , बरबादियों से क्या ? अब जब न तेरा मेरा कोई वास्ता रहा – मुझे तेरी तंदुरुस्ती औ’ बीमारियों से क्या ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more