पूछ काम कितना और क्या न करना पड़ता है ?

 फिर भी रूखी – सूखी से पेट भरना पड़ता है ।।1।।

 फ़स्ल की कहीं कोई भी नहीं कमी लेकिन ,

 अब भी कुछ ग़रीबों को घास चरना पड़ता है ।।2।।

 अपने हक़ की ख़ातिर अब इस निज़ाम में अक्सर ,

 बात – बात पर अनशन , धरना ; धरना पड़ता है ।।3।।

 कोई भी बुलंदी पे घर नहीं बना सकता ,

 चाँद पर पहुँचकर सबको उतरना पड़ता है ।।4।।

 हद न पार करने की सीख के लिए शायद ,

 रावणों को ऋषि बन सीताएँ हरना पड़ता है ।।5।।

 कृष्ण हों, सुदामा होंं , गाँँधी होंं या ओसामा ,

 जन्म जो भी लेता है , उसको मरना पड़ता है ।।6।।

 क्या करें ख़ुशामद में अपने हब्शी आक़ा को ,

 नौकरों को गोरा अँँग्रेज़ कहना पड़ता है ।।7।।

 सिर्फ़ इक रिझाने के वास्ते नहीं सजते ,

 कुछ लिहाज़ रखने को भी सँवरना पड़ता है ।।8।।

 हैंं कई ख़ुदा का भी ख़ौफ़ जो नहीं खाते ,

 रस्मन अपने आक़ा से उनको डरना पड़ता है ।।9।।

 दूसरों के खाने से भूख मिट नहीं सकती ,

 अपना पेट भरने को ख़ुद को चखना पड़ता है ।।10।।

 –डॉ. हीरालाल प्रजापति

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