इक हथकड़ी सा काँँच का कंगन लगा मुझे ।।

आज़ादियों का तोहफ़ा बंधन लगा मुझे ।।1।।

इस तरह साफ़ हो रहे हैं पेड़ शह्र से ,

दो गमले क्या दिखे कहीं गुलशन लगा मुझे ।।2।।

तनहाई दूर होगी ये आया था सोचकर ,

मेले में और भी अकेलापन लगा मुझे ।।3।।

जब तक ग़रीब था कमाई में लगा रहा ,

सबसे बुरा ,अमीर बन ; बस धन लगा मुझे ।।4।।

बच्चों के सच में आजकल हैं तौर इस तरह ,

बचपन में एक ख़ास बूढ़ापन लगा मुझे ।।5।।

माँ की अलोनी रोटियों में भी जो स्वाद था ,

होटल का चटपटा भी ना भोजन लगा मुझे ।।6।।

पत्थर भी देखता पिसा जब भूखे पेट मैं ,

आटा लगा कभी , कभी बेसन लगा मुझे ।।7।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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