आधुनिक समाज में मृत्यु-दंड को बर्बर करार देते हुए दुनिया के तमाम देश इसके विरोध में हैं और कई देशों में इसे समाप्त जैसा ही माना जा सकता है एवं जिसका एक ढ़ुल-मुल तर्क यह भी रहा है कि कल को किसी भी त्रुटि – वश फांसी पा चुका व्यक्ति बेगुनाह साबित हुआ तो क्या होगा और जैसा कि हमारा क़ानून इस मूल सिद्धांत पर न्याय करता है कि चाहे कितने ही गुनहगार छूट जायें किंतु एक बेगुनाह को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए…..ये अलग बात है कि सबूत और गवाहों की मोहताज हमारी अदालतों में सबूतों के अभाव अथवा झूठे सबूत और गवाहों की बिना पर इस सिद्धांत का अपराधियों को भरपूर लाभ प्राप्त हुआ है खैर । मैं बात दामिनी बलात्कार कांड को लेकर उसके मुजरिमों को दी जाने वाली सज़ा को लेकर अपने व्यक्तिगत विचार व्यक्त कर रहा हूँ हो सकता है आप भी मुझसे सहमत हो जायें । दामिनी बलात्कार अपने आप में एक अत्यंत असाधारण और जघन्य प्रकार का कांड है किंतु भावुक जनाक्रोशित बहुमत के आधार पर उसकी सज़ा का निर्धारण जो एकमेव एक सुर से मृत्यु रूप में पारित हुआ है कतई उचित और पर्याप्त ना होगा अर्थात उपरोक्त कांड के अपराधी प्रचलित मृत्यु दंड के सर्वथा अधिकारी नहीं हैं बल्कि उससे कहीं अधिक बड़ी सज़ा के हकदार हैं ।

आप और हम बखूबी यह जानते हैं कि मृत्यु का स्वयं वरण व्यक्ति अपनी असहनीय परेशानियों से निवृत्ति पाने के उपाय स्वरूप किया करता है अतः इस दृष्टिकोण से मृत्यु सजा नहीं बल्कि एक वरदान

है । इसके अलावा सजा का एक मात्र उद्देश्य अपराधी को प्रतारणा मात्र नहीं बल्कि उसका वांछित सुधार भी है जो उसे जीने का अवसर दिया जाकर ही संभव है किन्तु दामिनी टाइप के मामलों में जब मनुष्य जघन्यता की सारी हदें पार कर जाता है तब भी मृत्यु को सर्वोच्च सजा के तौर पर देखा जाना अपराधियों के प्रति एक दया का प्रदाय ही है , उन्हे मुक्ति देने का उपाय ही है जबकि न्यायकर्ता की  दृष्टि जिन्होंने  इस अत्याचार को झेला है उनकी तरफ होनी चाहिए , उनकी आत्मिक शांति पर केन्द्रित होनी चाहिए क्यूंकि वे बदला लेना चाहते हैं और इसके लिए वे अपराधियों कि तिल तिल मौत के आकांक्षी होते हैं न कि सौ – पचास दिनों की जेल के बाद एक ही झटके में बिना कष्ट के मिल जाने वाली मृत्यु के ।

हम फिल्में देखते हैं तो पाते हैं कि एक खलनायक तीन घंटे की पूरी फिल्म में मज़े से अत्याचार – अपराध करते हुए आखिरी के दो – चार मिनटों में बिना कोई कष्ट उठाए गोली खाकर ये फांसी पाकर मर भी जाता है तो भी वह नायक से अधिक सुखी प्रतीत होता है बल्कि मैं तो किसी ऐसी फिल्म की राह देख रहा हूँ जिसका आरंभ ही खलनायक की सजा के उपरांत हो और वह हमें यह सीख दे की वाकई ऐसे अपराध या अत्याचार नहीं करना चाहिए कि जिसकी सजा के तौर पर दी जाने वाली ज़िंदगी मौत से भयानक हो ।

दामिनी के बलात्कारियों को फांसी दे देना दामिनी अथवा उसके परिजनों के साथ न्याय नहीं होगा बल्कि बलात्कारियों को आसान मुक्ति मिल जाएगी । मैं क्या सोचता हूँ कि एक तो सजा का अर्थ है बदला किन्तु वह सदैव हाथ के बदले हाथ या सिर के बदले सिर नहीं हो सकता फिर भी जब कोई किसी के साथ उक्त प्रकार का दुष्कृत्य करता है तो पीड़िता को तभी शांति मिलेगी जब उसके मुजरिम को अत्यंत कड़ी सजा के जरिये यह एहसास दिलाया जाय कि उसने गलत किया है और इस अपराध – बोध से वह इतना तड़पे कि वह मृत्यु कि कामना करने लगे किन्तु उसे कहीं भी जहर न प्राप्त हो तो इसके लिए मेरे भावुक किन्तु बौद्धिक मन में रह – रह कर एक ही सजा सूझती है कि बलात्कारी को मृत्यु दंड की बजाय न केवल नपुंसकत्व और उम्रक़ैद की सजा हो बल्कि प्रतीकात्मक रूप से उसके नाक कान और होंठ भद्दे ढंग से काट दिये जाएँ , उसे सर्वथा अलग कोठरी में किसी अछूत की तरह एवं प्रकाश से सर्वथा दूर रखा जाये तो मेरा दावा है कि ऐसी सजा को पाने वाला मुजरिम बिना फांसी के ही अत्यंत तड़प – तड़प कर अपने आप को कोसता हुआ स्वयं ही बहुत जल्दी कुत्ते कि मौत मर जाएगा । यह देखने में अत्यंत अमानुषिक और दारुण तो होगा किन्तु दुनिया जानती है कि सजा कि भयंकरता के डर से ही लोग अपराध करने से डरते हैं । फांसी तो मुक्ति है असल कैद तो ज़िंदगी है ।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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