हर वक़्त न बनकर राम रहो ।।

मौक़ा-मौक़ा घनश्याम रहो ।।

पानी भी रहो शर्बत भी रहो ,

कभी चाय कभी-कभी जाम रहो ।।

दहलीज़ पे मंदिर-मस्जिद की ,

गर ख़ास रहो ; पर आम रहो ।।

बरगद का गर्मी में  साया ,

सर्दी में अलाव या घाम रहो ।।

जब देखो बबूल या नागफणी ,

कभी गुल , गुलशन , गुलफ़ाम रहो ।।

कोशिश न कभी अपनी छोड़ो ,

गर बाज़  दफ़ा नाकाम रहो ।।

बदनाम किसी क़ीमत पे न हों ,

जितना चाहे गुमनाम रहो ।।

जीना न अगर हो तो बेशक़ ,

ग़मगीन ही सुब्होशाम रहो ।।

औरों के रहो जी भर मालिक ,

बनकर अपनों के ग़ुलाम रहो ।।

यारों को रहो जीने की ख़बर ,

दुश्मन को क़ज़ा का पयाम रहो ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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