तलब में दोस्ती की दुश्मनों में जा पहुँचे।।

चले थे मस्ज़िदों को मैकदों में जा पहुँचे।।1।।

उड़ा के रख दिया सभी शराब ख़ोरी में ,

हवेलियों से तंग झोपड़ों में जा पहुँचे।।2।।

यही लगा कि होटलोंं में ठहरे सैलानी ,

तमाम ‘स्वर्ग’ नाम के घरों में जा पहुँचे।।3।।

लजाते जोंक चाल को भी काम में अफ़सर ,

जो भूले शासकीय दफ़्तरों में जा पहुँचे।।4।।

नहीं थे झूठ जो लगे थे उनपे इल्ज़ामात ,

परखने को चुनिंदा जब बड़ों में जा पहुँचे।।5।।

हुए जो रह के दूर वाक़िआत आपस में ,

तलाक़ भूल फिर से बिस्तरों में जा पहुँचे।।6।।

मिला न काम जब हमें किसी महक़मे में ,

तो हार नौकरी को तस्करों में जा पहुँचे।।7।।

– डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *