सुर्ख़ अंगार-दुपहरी का माहताब रहूँ ।।

बर्फ़ रातों में जला गर्म आफ़्ताब रहूँ ।।

और दुनिया के लिए मैं कभी-कभी हूँँ ख़ला ,

तेरी ख़ातिर मैं हमेशा गुले गुलाब रहूँँ ।।

जाने क्या है कि ज़माने को तो जँचूँ मैं मगर ,

उनकी नज़रों में हमेशा बहुत ख़राब रहूँ ।।

मेरी तासीर कि प्यासों के वास्ते मैं कभी ,

सिर्फ़ पानी तो कभी ज्वार की शराब रहूँ  ,

ताज , झुमका , न दुपट्टा ,न हार कुछ भी नहीं ,

चाह है उनकी फ़क़त जूती या जुराब रहूँ  ।।

ख़ुद को भी मैं न मयस्सर हूँ एक पल के लिए ,

उनके हर हुक़्म को हर वक़्त दस्तयाब रहूँ ।।

( ख़ला =नुकीली वस्तु ; जुराब =जुर्राब ,मोजा ; दस्तयाब =उपलब्ध )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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