मुझको हैरत है यह हुआ कैसे ?

ग़मज़दा खिलखिला रहा कैसे ?

बन गया साँप केंचुआ जैसा ,

लोमड़ी बन गई गधा कैसे ?

जब था मैं उसकी जाँ तो हैराँ हूँ ,

मैं मरा तो न वो मरा कैसे ?

इंसाँँ , इंसाँँ नहीं रहा बाक़ी ,

उसको तुम कह रहे ख़ुदा कैसे ?

जो अकड़ता था रब के भी आगे ,

आगे बन्दे के वो झुका कैसे ?

जो न चपरास के भी था क़ाबिल ,

आला अफ़सर वो फिर बना कैसे ?

लोग उस रोग से मरें सब ही ,

वो मरा साफ़ बच गया कैसे ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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