कि जैसे आपको नीर अपने घर का क्षीर लगता है ।।

ज़रा सा पिन किसी सुल्तान की शम्शीर लगता है ।।

तो फिर मैं क्या ग़लत कहता हूँ मुझको शह्र गर अपना ,

भयंकर गर्मियों में वादी-ए-कश्मीर लगता है ।।

डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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