मुझमें ख़ूब बचा है अब भी ,

मुझको यार चुका मत समझो ॥

राख तले हूँ लाल धधकता ,

इक अंगार बुझा मत समझो ।।1।।

यूँ अंदाज़-ए-जिस्म को तक तक ,

क्या-क्या तुम अंदाज़ लगाते ,

थपको मुँँह पर छींटे मारो ,

हूँ बेहोश मरा मत समझो ।।2।।

अर्श से गिरकर बोलो भला क्या ,

बच सकता है कोई धरा पर ,

गर मैं फिर भी ठीक-सलामत ,

हूँ तो इसको करामत समझो ।।3।।

लड़-लड़कर दुश्मन से मर

जाने का फ़ख़्र करे जावेदाँ ,

जान बचाकर भाग आने को ,

इक मक्रूह क़यामत समझो ।।4।।

हिन्दू को बस बोलो हिन्दू ,

मत बामन या शूद्र पुकारो ,

मानो मुसल्मानों को मुसल्माँ ,

सुन्नी और शिया मत समझो ।।5।।

पूजो तो ख़ुश हो जो न पूजो ,

तो दे दे जो श्राप हमें झट ,

बुत हो या वो ग़ैर मुजस्सम ,

उसको कोई ख़ुदा मत समझो ।।6।।

( करामत = चमत्कार ; जावेदाँ = अमर ; मक्रूह = घ्रणास्पद ; क़यामत = मृत्यु ;

बुत = मूर्ति ; ग़ैर मुजस्सम = निराकार )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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