मुझमें ख़ूब बचा है अब भी , मुझको यार चुका मत समझो ।।

राख तले हूँ लाल धधकता , इक अंगार बुझा मत समझो ।।

यूँ अंदाज़-ए-जिस्म को तक तक , क्या-क्या तुम अंदाज़ लगाते ,

थपको मुँँह पर छींटे मारो , हूँ बेहोश मरा मत समझो ।।

अर्श से गिरकर बोलो भला क्या , बच सकता है कोई धरा पर ,

गर मैं फिर भी ठीक-सलामत , हूँ तो इसको करामत समझो ।।

लड़-लड़कर दुश्मन से मर जाने का फ़ख़्र करे जावेदाँ ,

जान बचाकर भाग आने को , इक मक्रूह क़यामत समझो ।।

हिन्दू को बस बोलो हिन्दू , मत बामन या शूद्र पुकारो ,

मानो मुसल्मानों को मुसल्माँ , सुन्नी और शिया मत समझो ।।

पूजो तो ख़ुश हो जो न पूजो , तो दे दे जो श्राप हमें झट ,

बुत हो या वो ग़ैर मुजस्सम , उसको कोई ख़ुदा मत समझो ।।

( करामत = चमत्कार ; जावेदाँ = अमर ; मक्रूह = घ्रणास्पद ; क़यामत = मृत्यु ;

बुत = मूर्ति ; ग़ैर मुजस्सम = निराकार )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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