जो तुम चले जाते हो

तो

ये बहुत बुरा लगता है

कि

मुझे बिलकुल भी बुरा नहीं लगता ।

मैं चाहता हूँ

मुझे सबसे अच्छा लगे

जब तुम मेरे पास रहो ;

क्योंकि

हम बँधे हैं उस बंधन में ,

चाहे किसी भी परिस्थितिवश ;

जब तक दृष्टव्य है यह बंधन

सर्वमान्य है जिसमें यह

कि एक पल का बिछोह ,

या क्षण भर की ओझलता

कष्टकारी होती है ,

रुद्नोत्पादी होती है ;

सख़्त कमी की तरह खलती है ;

कुछ करो कि

मैं तुम्हारे बिना

अपना अस्तित्व नकारूँ ,

तुम्हे तड़प तड़प कर

गली-गली , कूचा-कूचा पुकारूँँ ,

जैसे नकारता पुकारता था

इस बुरा न लगने की परिस्थिति से पहले ;

क्या हो चुका है हमें ?

तुम भी बहुत कम मिलते हो ,

मुझे भी इंतज़ार नहीं रहता ;

तुम जाने को कहते हो

मैं रोकता नहीं हूँ ;

तुम्हे भी अच्छा लगता है , 

मुझे भी अच्छा लगता है ;

हमें एक दूसरे से

जुदा होते हुए ,

सिर्फ़ बुरा लगना चाहिए ;

सिर्फ़ बुरा ही लगना चाहिए  ।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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