झुण्ड में बकरियों के

नौजवान इक बक़रा  ,

गोपिकाओं में सचमुच

कृष्ण सा दिखाई दे ;

जबकि भरे यौवन में

तरसता अकेला हूँ  ;

किन्तु क़सम बक़रे की

लोभ नहीं मैथुन का  ,

मेरी नज़र में तो बस

उसका कसाई के घर  ,

काटने से पहले तक

पुत्र सा पाला जाना है  ।

मरने से पहले उसको हर

वो ख़ुशी मयस्सर है

जो कि गरीब इन्सां को

ख्वाब में भी दुष्कर है  ।

दो जून की रोटी को

दिन रात काम करता है  ,

फिर भी इतना मिलता है

कि पेट नहीं भरता है  ;

और अगर मरता है

तो खाली पेट मरता है  ।

बक़रा बेफ़िक्र  ,

भरे पेट कटा करता है  ;

अपने गोश्त से कितने

पेट भरा करता है  ।

हम तो न पाल पाते हैं ;

और न पले  जाते हैं  ;

क्यों वयस्क ( बालिग )होते हैं

बेरोज़गार दुनिया में  ?

सिर्फ़ पेट की चिंता में ही प्राण खोते हैं  ।

बक़रे नहीं मरा करते

वे तो क़ुर्बान होते हैं  ;

जो क़ुर्बान होते हैं

वे महान होते हैं ।

मुझको बक़रा बनना है

जन्म अगर हो अगला ।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *