रहने दो सबको अपने अपने मुगालतों में ।।

जो ख़्वाबों में मज़ा है , क्या है हक़ीक़तों में ?1।।

नाँ चाहकर भी अच्छा , अच्छाई भूल जाये ,

ऐ नाज़नींं न ऐसे पेश आ तू खल्वतों में ।।2।।

अच्छाई पर भी तेरी , अच्छा न कह सकेंगे ,

मिलता है इक मज़ा सा , जिनको शिकायतों में ।।3।।

उनका अजब है धंधा , साँसे उखाड़ने का ,

फिर आ के ख़ुद ही देना , काँँधा भी मय्यतों में ।।4।।

पत्थर में देवता की , सूरत तराश ली है ,

किसको है फ़िक्र असर की , अपनी इबादतों में ?5।।

बदशक्लों की उड़ाना , मत तुम हँसी हसीनों ,

कितनों ने ली है ख़ुद की , जाँ इन शरारतों में ।।6।।

आपस में ही सुलझ लो , अद्ना मुआमला है ,

इक उम्र होती लाज़िम , अपनी अदालतों में ।।7।।

मिलता कहाँ सुकूत अब , शहरों के बीच क़ाइम ,

( इ ) स्कूलों , अस्पतालों , मंदिर औ’ मरघटों में ?8।।

( सुकूत = मौन )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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