इस क़दर नीचता नंगपन छोड़ दो।।

लूटलो सब कमजकम कफ़न छोड़ दो।।

इसमें रहकर इसी की बुराई करें ,

ऐसे लोगों हमारा वतन छोड़ दो।।

हो बियाबान के दुश्मनों रहम कुछ ,

यूँँ लहकते-महकते चमन छोड़ दो।।

उनकी ख़ातिर जो चिथड़े लपेटे फिरें ,

एक दो क़ीमती पैरहन  छोड़ दो।।

दम हो जाकर दिखाओ जलाकर उन्हें ,

उनके भूसे का पुतला दहन छोड़ दो।।

ले लो , ले लो मेरी जान तुम शौक़ से .

मैंने मर-मर जो जोड़ा वो धन छोड़ दो।।

नाम ही नाम हो ज़िन्दगी न चले ,

ऐसा हर शौक़ हर एक फ़न छोड़ दो।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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