मुक्तक : 80 – क्यों बचपन में ही

  ( चित्र Google Search से साभार ) क्यों बचपन में ही श्रृंगारिक प्रेमालिप्त हैं कुछ बच्चे ? ऐसी-वैसी बातों से अंदर तक सिक्त हैं कुछ बच्चे ? क्या माँ की ममता बापू का स्नेह उन्हें कम पड़ता है ? जो...Read more

57 : ग़ज़ल – हर सिम्त जुल्मो

हर इक सिम्त ज़ुल्मो सितम हो रहा है ॥ जिसे देखो गरमा गरम हो रहा है ॥ ख़ुदा मानकर पूजता हूँ जिसे मैं , वो पत्थर न मुझ पर नरम हो रहा है ॥ शगल जिसका कल तक था मुझको हँसाना ,...Read more

मुक्तक :79 – उम्र भर इश्क़

उम्र भर इश्क़ लगा सख़्त नागवार मुझे ।। क़ौमे आशिक़ से ही जैसे थी कोई खार मुझे ।। कितना अहमक़ हूँ या बदक़िस्मती है ये मेरी , वक़्ते रुख़्सत हुआ है इक हसीं से प्यार मुझे ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

कविता :देखकर तुझको मेरे

देखकर तुझको मेरे दिल में ख़याल आए यही / तू है जितनी खूबसूरत स्वर्ग में भी तो नहीं / कृष्ण तझको देख लें तो भूल जाएँ राधिका / इन्द्र तुझसे ब्याह की करने लगेंगे याचना / सोचता हूँ देखता हूँ जब तेरे मुखड़े की...Read more

मुक्तक : 78 – कुछ को ऊँची

कुछ को ऊँची सी अटारी पे खड़ा लगता हूँ ।। कुछ को इस शह्र के गटर में पड़ा लगता हूँ ।। कुछ सघन सब्ज़-ओ-सायादार मुझे कहते हैं , कुछ को सूखा, विरल व पत्रझड़ा लगता हूँ ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 77 – फ़क़ीरी में जो ख़ुश

फ़क़ीरी में जो ख़ुश मत उसको धन-दौलत अता करना ॥ मोहब्बत के तलबगारों को मत नफ़्रत करना ॥ ख़ुदा क्या किसको लाज़िम है बख़ूबी जानता है तू , लिहाज़ा माँगने की मत मुझे नौबत अता करना ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more