मेरे अँधेरों को भी इक आफ़्ताब देना ।।

जो ज़िंदगी बदल दे , ऐसी किताब देना ।।

हरगिज़ तलब न शर्बत-ओ-शराब की है मुझको ,

बस तिश्नगी को मेरी मक्के का आब देना ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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