वो जवाहर , वो सीमोज़र , वो पाक लगते हैं ।।

उनके हम आगे लोह , संग , ख़ाक लगते हैं ।। 

वो अमलतास , अशोक , देवदार वो पीपल ,

हम तो महुआ बबूल बेर ढाक लगते  हैं ।।

वो बहुत रोबदार , ख़ूब-ख़ास दिखने में ,

हम न तो बाअसर , न ठीक-ठाक लगते हैं ।।

वो महकते हुए गुलाबी , संदली पौडर ,

हम सड़क-धूल , बाजरे की राख लगते हैं ।।

गिन्नी-दीनार वो लिरा , वो पौण्ड-डॉलर भी ,

हम तो कौड़ी की एक फूटी आँख लगते हैं ।।

हम नहीं एक टन से एक रत्ती कम लेकिन ,

उनके बरअक्स सच किलो-छटाँक लगते हैं ।।

बस समझते हैं वो ही हमको पोला सरकण्डा ,

 बाक़ी दुनिया को हम भरी सलाख लगते हैं ।।

कृष्ण छिगुनी पे ही उठाएँ पूरा गोवर्धन ,

राम के आगे क्या कहीं पिनाक लगते हैं ?

इतना उजला है उनका रंग इतना उजला है ,

हंस , बगुले भी उनके आगे काक लगते हैं ।।

जितने लगते हसीन , भोले वो ख़ुशी के दम ,

उससे ख़फ़गी में उतने खौफ़नाक लगते हैं ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

 

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