पहले थे नर्मोनर्म गुल अब केक्टस हुए ।।

अंजन नयन के आज पकी मिर्च जस हुए ।।

कल तक वो बीड़ी ,जर्दा से सस्ते सुलभ रहे ,

 अब क़ीमती सिगार ,अफ़ीमो-चरस हुए ।।

पहले थे उनके दूध में हम जाफ़रान से,

आज इक बड़ी क़रीह सी काली मगस हुए ।।

सब कुछ था हममें  सिर्फ़ न थी खूबसूरती ,

हम नींव में गड़े वो चमकते कलस हुए ।।

जब से मिला है उनको किसी नाज़नीं का प्यार ,

सूखे थे वो सुपारी से गन्ना सरस हुए ।।

करता हूँ उसको याद मैं अब भी बुरी तरह ,

जिसने मुझे भुला दिया बरसों-बरस हुए ।।

जीते जी उनको जान न पाए पड़ोसी भी ,

मरने के बाद जिनके ज़माने में जस हुए ।।

करने को उनकी धूप को कुछ और चिलचिली ,

पूनम के सब चिराग़ अमा के तमस हुए ।।

चुभवा लीं सुइयाँ हँसके जगह से हिले बग़ैर ,

इक गुदगुदी के नाम से झट टस  से मस हुए ।।

   (करीह =घिनौनी ,मगस =मक्खी )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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