उड़ा दे मुझको गोली से या चाकू घोंप ले मुझको ॥

किसी भी शर्त पर लेकिन तू ख़ुद को सौंप दे मुझको ॥

भटकता फिर रहा हूँ बीहड़ों में ज़िंदगानी के ,

न दे बेशक़ कोई मंज़िल दिखा दे रास्ते मुझको ॥

न कर तू याद रब दी सौं गिला कोई नहीं होगा ,

भुलाने की न कर कोशिश ख़ुदा के वास्ते मुझको ॥

न ऐसे खिलखिलाके मुझसे कर बातें तू लग लग के ,

कहीं तुझसे न हो जाए ख़िरामा इश्क़ रे मुझको ॥

मेरी गज़ भर ज़ुबाँ है तुझको गर ऐसा लगे तो सुन ,

ग़ज़ल भी मैं कहूँ तो आगे बढ़कर टोक दे मुझको ॥

अगर चाहे मैं टुकड़े-टुकड़े से फिर एक हो जाऊँ ,

तो दे कुछ ताक़तें , कुछ हिम्मतें , कुछ हौसले मुझको ॥

मेरा आँगन सड़क-फ़ुटपाथ नीला आस्माँ छप्पर ,

तरस मत खा या कर ख़ैरात इक-दो झोपड़े मुझको ॥

 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

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