पानी में रह के बैर मगरमच्छ से लिया ॥

जीना था कई साल मगर सिर्फ़ कुछ जिया ॥

दुनिया में सबकी बात अदब से सुनी मगर,

जो दिल को ठीक-ठाक लगा बस वही किया ॥

आँखोंं को मूँद जब भी किया है यक़ीन सच ,

जिसपे किया उसी ने बराबर दग़ा दिया ॥

नाकामयाब कितने रफ़ूगर यहाँ हुए ,

चिथड़ों को मेरे उनके सिए ना गया सिया ॥

टिंडे का काम हमने चलाया तरोई से ,

गर नीम मिल सकी न करेला चबा लिया ॥

गंदा है फिर भी पानी है पीले यूँ थार में,

प्यासों ने वक़्त-वक़्त पे पेशाब तक पिया ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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