जो पाले नेवले उसको , न लाके साँप दो भाई ।।

हो जिसके हाथ में पत्थर , उसे मत काँच दो भाई ।।

न ऐसे नाक भौं अपनी , सिकोड़ो आँख मत मींचो,

जो  दिखता हो कोई नंगा , उसे बस ढाँप दो भाई ।।

जिन्हें नज़्ला-ओ-सर्दी है , मुफ़ीद उनको ही ये होगी,

सुलगते हैं जो गर्मी में , उन्हें मत आँच दो भाई ।।

अगर करना हो सदक़ा तो वसीअत में दमे आख़िर ,

किसी को अपने गुर्दे और किसी को आँख दो भाई ।।

जला है दूध से इतना , कि अब तो एहतियातन वो,

न पीता फूँके बिन चाहे , बरफ़ सा छाँछ दो भाई ।।

जो करते हैं ज़बरदस्ती , हैं दहशतगर्द-दंगाई ,

कलम कर उनके सर खम्भों के ऊपर टाँग दो भाई ।।

न शाए‘ हो सका जो वो , मेरा इस आख़िरी दम में,

क़ुरासा मत पढ़ो ; दीवान लाकर बाँच दो भाई ।।

[शाए‘=प्रकाशित ;क़ुरासा=पवित्र ग्रन्थ/कुरान ;दीवान=ग़ज़ल संग्रह ] 

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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