मैं न बँगला , न हवेली , न कोई घर ढूँढूँ ।।

सर छिपाने के लिए एक छान भर ढूँढूँ ।।1।।

जिसके हर घर में बगीचा हो एक हो आँगन ,

गाँव जैसा हो वैसा ही इक नगर ढूँढूँ ।।2।।

ना मिठाई , न दवा-दारू , ना कोई फल-वल ,

पेट की भूख जो मारे मैं वो ज़हर ढूँढूँ ।।3।।

तेंदुआ , बाघ न चीता , न कोई भी बिल्ली ,

मैं तो गब्बर ओ ज़बर शेर-ए-बबर ढूँढूँ ।।4।।

सुब्ह का , शाम का सूरज , न तो सितारे ही ,

मैं तो हर रात को , चौदहवीं का क़मर ढूँढूँ ।।5।।

जिसने तक़्लीफ़ न झेली , न ग़म उठाया हो ,

सारी दुनिया में फ़क़त ऐसा इक बशर ढूँढूँ ।।6।।

उनको गर मुझमें ख़राबी और ऐब दिखते हैं ,

मैं भी फिर उनमें इक अच्छाई इक हुनर ढूँढूँ ।।7।।

ज़िंदगानी को अता करने इक सही मा’नी ,

अपनी मंज़िल के लिए नेक रहगुज़र ढूँढूँ ।।8।।

रोज़ मिलती है बुरी रोने की , रुलाने की ,

इक ज़माने से ज़रा सी मैं ख़ुश-ख़बर ढूँढूँ ।।9।।

  ( छान = छप्पर , क़मर =चाँद , बशर =आदमी  )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

 

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