याँ पर आगी धू-धू जलती , जाकर दमकल ले आओ ।।

कुछ मत पूछो पानी-वानी तुम तो बोतल ले आओ ।।1।।

उजले-उजले सूरज-चंदा आँखों में मेरी चुभते ,

अँधियारी काली रातों के , तारे झलमल ले आओ ।।2।।

ऊनी , सूती , रेशम , खादी , के मत मुझको दो गट्ठर ,

बस चाहे इक ही टुकड़ा , ढाका कि मलमल ले आओ ।।3।।

नीले-नीले नभ के सूरज , चंदा , तारे सब ढँक दो ,

सूखा रो-रो चीखे काले-काले बदल ले आओ ।।4।।

इस उपवन का सन्नाटा , सबसे बोले कोई इसमें ,

चिड़िया ,तोता ,मैना , बुलबुल , कोयल , गलगल ले आओ ।।5।।

पोखर के ठहरे पानी के जैसा जीवन मत रोको ,

निकलो कूपों , तालों से , नदियों सी हलचल ले आओ ।।6।।

बस इक शर्त पे तुमको दिल से , मैं कर दूँगा माफ़ अगर ,

मुझसे छीने थे जो अच्छे , इक या दो पल ले आओ ।।7।।

सब कुछ लूट के ही बीमार का तब ये चारागर बोला ,

जो पहले ही कह देना था ‘बस गंगा जल ले आओ’ ।।8।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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