कि दो वक़्त रोटियों का , अगर इंतिज़ाम होता ।।

तो भूखों में ही सही पर , कहीं एहतिराम होता ।।1।।

जो बरदाश्त ही न होती , वो ही मुझमें प्यास होती ,

तो हाथों में मेरे भी इक , ठो लबरेज़ जाम होता ।।2।।

ज़रूरी न थी रे साज़िश , मुझे मारने की मुझसे ,

तेरा हँस के ‘ जान दे दो ‘ , ही कहना तमाम होता ।।3।।

कि संजीदगी से अपने , अगर फ़न को ले मैं लेता ,

तो दुनिया में आज मेरा , भी हर सिम्त नाम होता ।।4।।

तो मुझसे निकाह पढ़ने , को महबूबा मान जाती ,

जो इक नौकरी ही होती , या फिर काम धाम होता ।।5।।

क्या होता नहीं वो इंसाँ , बताओ तो मुझको कोई ,

जो होता किसी का ख़ादिम , किसी का ग़ुलाम होता ?6।।

  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

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