मेह्रबानी भी मुझे उसकी क़हर लगती है ।।

यूँँ पिलाती है दवा वो कि ज़हर लगती है ।।1।।

सींचती है वो इस अंदाज़ से सच तुलसी भी ,

पूरे सौ साल का पीपल का शजर लगती है ।।2।।

दिल्ली , कलकत्ता भी ,मुम्बई भी उसे गाँव लगे ,

हमको इक अद्ना सी बस्ती भी शहर लगती है ।।3।।

सुब्ह सा है न मिजाज़ उसका है शामों जैसा ,

रात आधी वो या फिर भर दुपहर लगती है ।।4।।

वो मँगाकर ही पहनती है मँगाकर खाती ,

शक्लो सूरत से रईसाना मगर लगती है ।।5।।

चाँद का लगती है टुकड़ा वो हमेशा लेकिन ,

जब वो सजती है सँवरती हैं क़मर लगती है ।।6।।

(क़मर = चाँद )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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