क्या मिलेगा रात-दिन सब छोड़कर पढ़के यहाँ ।।

माँजते बर्तन जहाँ एम. ए. किये लड़के यहाँ ।।1।।

 जेब हैं फुलपेंट में उनके कई किस काम के ,

जब टटोलोगे तो पाओगे वही कड़के यहाँ ।।2।।

 ढूँढती फिरती हैं नज़रें इक अदद वैकेन्सी ,

उनका दिल तक कर हसीनाओं को ना धड़के यहाँ ।।3।।

 कुछ तो छूने के लिए बेताब हैं ऊँचाइयाँ ,

अपने गड्ढों से निकलने लाशों पे चढ़के यहाँ ।।4।।

 कुछ क़ुुुसूूर उनका नहीं जो दिन चढ़े तक सोयें वो ,

रात भर जगते हैं तो कैसे उठें तड़के यहाँ ।।5।।

 उनका सपना है कि गलियाँ गाँव की समतल रहें ,

जबकि गड्ढों से अटी हैं शहरों की सड़कें यहाँ ।।6।।

 पहले थर्राते थे दरवाज़ो शजर तूफाँ से सच ,

खिड़कियाँ क्या अब तो पत्ता तक नहीं खड़के यहाँ ।।7।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *