पूरा पूरा उजड़ गया हूँ ॥

जबसे तुझसे बिछड़ गया हूँ ॥

बरगद सा मैं जमा हुआ था ,

नीलगिरी सा उखड़ गया हूँ ॥

अब न रफ़ूगर मुझे समझना ,

मैं ही सिरे से उधड़ गया हूँ ॥

तेरी ख़ातिर था रहनुमा मैं ,

तुझ बिन सबसे पिछड़ गया हूँ ॥

अब मस्जिद की जगह मैं रस्ता ,

मैख़ाने का पकड़ गया हूँ ॥

क़ाबू में था , था जब तू निगराँ ,

खुल्लम-खुल्ला बिगड़ गया हूँ ॥

दर्या होना था ग़ैर मुमकिन ,

पोखर बनकर मैं सड़ गया हूँ ॥

( रहनुमा =पथप्रदर्शक ,निगराँ =देखरेख रखने वाला )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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