पूछ तो क्यों रो रहे हैं ?

कौन सा ग़म ढो रहे हैं ?

रात भर जागे नहीं , क्यों 

दिन चढ़े तक सो रहे हैं ?

क्यों खुशी की बात पर भी 

ग़मज़दा यों हो रहे हैं ?

पत्थरों में किस बिना पर 

बीज आख़िर बो रहे हैं ?

अब नहीं पहचानते ‘जो’ 

अपने कल तक ‘वो’ रहे हैं ?

साबका किससे पड़ा है 

अपना आपा खो रहे हैं ?

काम को क्या खेल समझें 

खेल अब काम हो रहे हैं ॥ 

हो रहे हैं आज बढ़कर 

हमसे कमतर जो रहे हैं ॥ 

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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