पहले दो इक छोड़ सभी सिंगार सजाकर निकले हैं वो ॥

आज नहाये थे जो नहीं सो इत्र लगाकर निकले हैं वो ॥

जाने क्या लेकिन उनने कुछ भूल यक़ीनन की है वर्ना ,

आँख दिखाने वाले कैसे आँख बचाकर निकले हैं वो ?

उनके रँग-ढँग चाल को तुम जो ग़ौर से देखो पहचानोगे ।।

नरभक्षी कुछ भेड़िये गौ का खोल चढ़ाकर निकले हैं वो ॥

झूठे गवाहों , फ़र्ज़ी सबूतों की ही बिना पर मासूमों को ,

आख़िर मुंसिफ़ आह ! सज़ा-ए-मौत सुनाकर निकले हैं वो ॥

तनहा इक मुँहबोली बहन के घर से मुजर्रद कहलाते जो ,

अक़्सर देखा और सुना भी रात बिताकर निकले हैं वो ॥

जाओ जाकर देखलो अपनी आग लगाने का मंज़र तुम ,

ख़ुद ही झुलसकर बैठे हैं जितने लोग बुझाकर निकले हैं वो ॥

इस कालिख इस राख़ को खंडर की न समझ लेना तू ज़ालिम ,

तेरी ख़ातिर अपना नया घरबार जलाकर निकले हैं वो ॥

( मुंसिफ़=न्यायकर्ता , मुज़र्रद=ब्रह्मचारी )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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