टीले से पत्थरों का हो गया पहाड़ सा ।।

नाजुक से पौधे से बना कँटीले झाड़ सा ।। 

जो कुछ हूँ फ़ख्र है ख़ुद अपनी वज़्ह से ही हूँ ,

अब बोनसाई हूँ या बाँस हूँ या ताड़ सा ।। 

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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