हो आग जाँ लगी वाँ , दमकल की अब पहुँच हो ॥

ठण्डी लहर चले जाँ , कंबल की अब पहुँच हो ॥

दर्या के कब किनारे , तालाब हों ज़रूरी ,

जिस घर नहीं कुआँ वाँ , इक नल की अब पहुँच हो ॥

कपड़े न हों , न हो छत , लेकिन ग़रीब तक बस ,

रोज़ाना दाल-रोटी , चावल की अब पहुँच हो ॥

जिनकी रपट भी कोई , लिखता नहीं ख़ुद उन तक ,

थाने , अदालतों की , दल-बल की अब पहुँच हो ॥

गुलशन में फूल तो हों , और संग तितलियों के ,

बुलबुल की , तोता , मैना , कोयल की अब पहुँच हो ॥

बदबू से साँस लेना , भी हो जहाँ पे मुश्किल ,

उस बस्ती में जलाने , गुग्गल की अब पहुँच हो ॥

हो इंतिज़ाम ऐसा , बच्चों तलक तो हरगिज़ ,

गुटखा , न बीड़ी और ना , बोतल की अब पहुँच हो ॥

या रब कमाल कर दे , ऐसा कि तपते प्यासे ,

मरुथल में रोज़ गंगा , से जल की अब पहुँच हो ॥

( गुग्गल = सुगंधित द्रव्य )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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