अजब नासेह है पर काटकर कहता है उड़ने को ।।

निगाहें फोड़कर बोले सितारे तकने-गिनने को ।।

मुझे तालीम देने फ़त्ह की उस्ताद मुझसे सब ,

छुड़ा हथियार भेजे अपने धुर दुश्मन से लड़ने को ।।

ज़माने भर से बतियाता है बेहद प्यार से , मुझसे ,

बिना के बिन लड़ा करता है बढ़ता है झगड़ने को ।।

फ़क़त उँगली थमाने से न उसका काम चलता है ,

वो हो जाता है फिर पहुँचा कभी गर्दन पकड़ने को ।।

नशे में धुत्त तब भी होश की ही बात करता है ,

बुरा कहता है पीने और फिर पीकर बहकने को ।।

बहुत मौक़ा हमें अपनी सुनाने का वो दे आकर ,

कि जब तक खोलते हैं लब वो हो जाता है चलने को ।।

वो जानी दोस्त मेरा दुश्मने जाँ ही तो बन जाता ,

जो बोलूँ उससे यों ही भी ज़रा सा इश्क़ करने को ।।

समझना मत उसे फैशन की फ़र्माइश बदन ढँकने ,

फटेहालों ने माँगीं हैं जो कुछ उतरन पहनने को ।।

ख़ुद अपने झाँककर देखें गिरेबाँ में जो औरों से ,

हो मौक़ा या न हो कहते मगर रहते सुधरने को ॥

(नासेह =उपदेशक ,बिना =आधार ,पहुँँचा =कलाई )

डॉ. हीरालाल प्रजापति

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