मुझको जीने की मत दुआ दो तुम ॥

हो सके दर्द की दवा दो तुम ॥

क्यों हुआ ज़ुर्म मुझसे मत सोचो ,

जो मुक़र्रर है वो सज़ा दो तुम ॥

मुझको हमदर्द मानते हो तो ,

अपने सर की हर इक बला दो तुम ॥

मैं तो तुमको बुला-बुला हारा ,

कम से कम अब तो इक सदा दो तुम ॥

यूँ न फूँको कि बस धुआँ निकले ,

ख़ाक कर दो या फिर बुझा दो तुम ॥

रखना क़ुर्बाँ वतन पे धन दौलत ,

गर ज़रूरत हो सर कटा दो तुम ॥

वो जो इंसाँँ बनाते हैं उनको ,

कुछ तो इंसानियत सिखा दो तुम ॥

फँस गया हूँ मैं जानते हो गर ,

बच निकलने की रह बता दो तुम ॥

 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

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