चटाई को ही गद्दा-तौलिया-चद्दर समझते हैं ॥

जो नींद आ जाए धरती को पलँग-बिस्तर समझते हैं ॥

ख़ुशी में मानते बगुले को भी हम हंस बिन हिचके ,

रहें नाराज़ तो रेशम को भी खद्दर समझते हैं ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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