घर में जो मेरे दुश्मन , ने आग क्या लगा दी ?

तुमने हवाओं अपनी , रफ़्तार ही बढ़ा दी ।।1।।

देकर बयान अपना , बस चश्मदीद बैठे ,

मुंसिफ़ ने बेगुनह को , चट क़ैद की सज़ा दी ।।2।।

आसाँ मुआमले कब , होते हैं कचहरी के ,

मैंने यूँ ही न थाने , जाकर रपट लिखा दी ।।3।।

खाने तलक के लाले , पड़ जाएँगे जो सारी ,

मैंने रकम उधारी , की आज ही चुका दी ।।4।।

पीता नहीं हूँ लेकिन , यारों ने आज मुझको ,

अपनी मोहब्बतों की , देके क़सम पिला दी ।।5।।

बस इक अमीर मुझको , इस दुनिया में गिना दो ,

अपनी कमाई जिसने , ग़ैरों पे सब लुटा दी ।।6।।

सरकारी नौकरों पे , महँगाई का असर क्या ?

मजदूर की तो इसने , बस वाट ही लगा दी ।।7।।

उसको लगाने फिर से , हम पार चल दिए हैं ,

जिसने कि बारहा ही , कश्ती मेरी डुबा दी ।।8।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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