कमरे मिलते हैं घर नहीं मिलते ।।

खूब ढूँढो मगर नहीं मिलते ।।1।।

शोरगुल भाग दौड़ से खाली ,

आज कोई शहर नहीं मिलते ।।2।।

मुफ़्त नुस्खा ही लिख दें मुफ़्लिस को ,

ऐसे अब चारागर नहीं मिलते ।।3।।

दिल भी चेहरों से उजले रौशन हों ,

लोग अपने इधर नहीं मिलते ।।4।।

है गुनाहों का दौर क्यों ; क्या अब –

बददुआ में असर नहीं मिलते ?5।।

दोस्त अब हाथ भर मिलाते हैं ,

अब गले दौड़कर नहीं मिलते ।।6।।

क्या दवाओं की हम कहें यारों ,

अब निखालिस ज़हर नहीं मिलते ।।7।।

सब ज़बरदस्त दिखते बाहर से ,

अंदरूनी ज़बर नहीं मिलते ।।8।।

( मुफ़्लिस = ग़रीब ,चारागर = डॉक्टर , ज़बर = शक्तिशाली )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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