सारे ही जग से झगड़ूँ कब उससे लड़ता हूँ ?

फिर भी उसकी आँखों में चुभता हूँ , गड़ता हूँ ।।

उसके पथ में फूलों सा मैंं रहता बिछ-बिछ कर ,

पर उसको लगता कंटक-रोड़ोंं सा अड़ता हूँ !!

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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