गुलशन की , बुलबुलों की , गुलफ़ाम की ही बातें ।।

होंगीं बस आज ऐशो आराम की ही बातें ।।1।।

फ़ुर्सत में हूँ लतीफ़े कह , सुन या फिर लड़ा गप,

मत कर तू आज हिंदू – इस्लाम की ही बातें ।।2।।

सूखे की रेगज़ारों की प्यास को भुलाकर ,

कर आज छलछलाते मै – जाम की ही बातें ।।3।।

पर्वा ज़माने भर की तू छोड़ बस अभी तो ,

सोच अपने फ़ायदे की निज काम की ही बातें ।।4।।

मत झोपड़ी के छप्पर-आँगन का ज़िक्र कर तू ,

कर आज महलों के फ़र्शो बाम की ही बातें ।।5।।

क़िस्सा-ए-ज़ौक़-ए-वस्ल अब तू छेड़ दे किसी का ,

कर हिज्र की न इश्क़े नाकाम की ही बातें ।।6।।

मत ज़िक्र बर्फ़ का कर सर्दी में तू यहाँ ,

कर चाय की , अलावों की , घाम की ही बातें ।।7।।

कह तो रहा हूँ मैं बेईमान नाँह हरगिज़ ,

साबित करो या फिर सब इल्ज़ाम की ही बातें ।।8।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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