पाँव में फटते ज्यों आ जाती हैं ज़ुराबें नई ।।

ख़त्म होते ही ढलतीं प्यालों में शराबें नई ।।

कोई पन्ने भी पलटता नहीं है उनके मगर ,

उनकी छप छप के चली आती हैं किताबें नई ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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