( चित्र Google Search से साभार )

पाँव में फटते ही आ जाएँ ज्यों ज़ुराबें नई ।।

ख़त्म होते ज्यों ढलें प्यालों में शराबें नई ।।

कोई पन्ने भी पलटता नहीं है उनके मगर ,

उनकी छप-छप के चली आती हैं किताबें नई ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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