है अब तो घी और आलुओं के मिश्र का चलन ॥

होगा कभी विशुद्ध का पवित्र का चलन ॥

था बुद्धमत कि मत सुगंधियाँ प्रयुक्त हों ,

चेलों में ही अब उनके ख़ूब इत्र का चलन ॥

सावित्रियाँ कहानियों से लुप्त हो चलीं ,

वारांगनाओं जैसे अब चरित्र का चलन ॥

होती थीं बस सहेलियाँ ही औरतों की तब ,

अब तो अगल-बगल में मर्दमित्र का चलन ॥

अब भाई-भाई ,भाई के जैसे कहाँ रहे ,

ना राम का चलन है ना सुमित्र का चलन ॥

लिम्का-गिनीज़ बुक में नाम को मनुष्य में ,

कुछ ऊट , कुछ पटाँँग , कुछ विचित्र का चलन ॥

हो जाता ओट से ही सच नुमायाँ हुस्न अगर ,

होता कभी न बेलिबास चित्र का चलन ॥

दो माँओं की तो बात अब लगे नई नहीं ,

संदेह है न चल पड़े दो पित्र का चलन ॥

( वारांगना = वेश्या ,रंडी / मर्दमित्र = पुरुषमित्र ,ब्वॉयफ्रेंड / सुमित्र =सौमित्र ,लक्ष्मण  / नुमायाँ = व्यक्त )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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