तुझे भूलकर भी , भुला ना सका हूँ ।।

मैं दिल से तुझे क्यों , हटा ना सका हूँ ?1।।

बहुत चाहा लेकिन , किसी भी तरह का ,

तेरा कोई भी ख़त , जला ना सका हूँ ।।2।।

नहीं बेवफ़ा पर , नहीं झूठ ये भी ,

मैं कोई भी वादा , निभा ना सका हूँ ।।3।।

मैं शर्मिंदा इतना , मेरे काम से हूँ ,

अभी भी झुका सर , उठा ना सका हूँ ।।4।।

ज़माना करे चाँद – सूरज की बातें ,

ज़मीं से मैं पीछा , छुड़ा ना सका हूँ ।।5।।

हूँ मैं ही सबब तेरे तक़्लीफ़ो-ग़म का ,

पर इल्ज़ाम ख़ुद को , लगा ना सका हूँ ।।6।।

मैं अश्कों को पीने , में माहिर नहीं बस ,

मैं सदमे से आँसू , गिरा ना सका हूँ ।।7।।

चले आओ तुम चार काँधों को लेकर ,

मैं जान अपनी अब के , बचा ना सका हूँ ।।8।।

बहुत चाहता था , जो तू चाहता था ,

मगर बन के मैं वो , दिखा ना सका हूँ ।।9।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *