जिससे होता था आर-पार , वो कश्ती न रही ।।

जिसमें महफ़ूज़ रह रहा था , वो बस्ती न रही ।।

आम इंसाँ हूँ न जी पाऊँ , न मर भी मैं सकूँ ,

जह्र महँगा हुआ दवा भी , तो सस्ती न रही ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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