रो रो के अपने ग़म को सुनाने से फ़ायदा ?

हँसते हुओं को क्या है रुलाने से फ़ायदा ?

जिसमें न तारा चाँद न सूरज रहा कोई ,

मंजर उस आँख को क्या दिखाने से फ़ायदा ?

आराम का है काम औ’ फिर वक़्त भी बहुत ,

फिर जल्दी , हाय-तौबा मचाने से फ़ायदा ?

हो जाए बिगड़ा कुछ जो मरम्मत से गर नया ,

फिर दूसरा ख़रीद के लाने से फ़ायदा ?

तेरे लिए ही तो वहाँ ताला पड़ा हुआ ,

उस दर पे घंटियों को बजाने से फ़ायदा ?

दो चार दिन में तय है अगर मर ही जाऊँगा ,

चारागरों को घर पे बुलाने से फ़ायदा ?

कॉलेज , अस्पताल , सरायें हैं लाज़मी ,

मंदिर क़दम क़दम पे बनाने से फ़ायदा ?

नुक़्साँ को ही तुम अपने अगर समझो फ़ायदा ,

फिर फ़ायदे की बात बताने से फ़ायदा ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *