पूरा औरों पर ही मुन्हसिर ,जीते रहने में भला है क्या ?

जब होना ही ठीक ना हमें , आख़िर पीने से दवा है क्या ?

दिल का आलम सख़्त दर्द का , मस्ती के गाने बजाओ मत ,

सुन-सुनकर तो और भी बढ़े ,ग़म ऐसे में कम हुआ है क्या ?

सालों बीते ठीक उस तरह , का कोई इंसान दूसरा ,

बाद उसके तस्वीर के सिवा , दुनिया में फिर मिल सका है क्या ?

भलमनसत में साहुकार भी , दे देगा कुछ क़र्ज़ सूद बिन ,

पर पूछेगा पास आपके , रखने कुछ गिरवी रखा है क्या ?

अब आए हो आए क्यों न तुम , जब सब कुछ था हाथ में मेरे ,

फिर भी माँगो वैसे पास में , तुमको देने अब बचा है क्या ?

बतला तो क्योंकर हुआ है लू , के जैसा बादे सबा से तू ,

लेकिन ज्यों मैं खाक हूँ हुआ , तेरा भी यों दिल जला है क्या ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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