मुक्तक : 187 – सचमुच विनम्रता

सचमुच विनम्रता तो जैसे खो गई ॥ अहमण्यता प्रधान सबमें हो गई ॥ दिन रात हम में स्वार्थ जागता गया , परहित की भावना दुबक के सो गई ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक :186 – टोपी बंडी कुर्ता

टोपी बंडी कुर्ता क्या है पाजामें फटवा दूँगा ॥ संसद से हर गली सड़क तक हंगामें मचवा दूँगा ॥ मैं मतदाता हूँ विवेक से वोट अगर देने चल दूँ , कितने ही कुर्सी सिंहासन उलट पलट करवा दूँगा ॥ -डॉ....Read more

मुक्तक :185 – अब न ताक़त

अब न ताक़त न वो चुस्ती न फुर्ती यार रही ॥ उम्रे बावन में अठारह की न रफ़्तार रही ॥ जिसने काटा था सलाख़ों को लकड़ियों की तरह , वो मेरे जिस्म की तलवार में न धार रही ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

■ मुक्तक : 184 – ख़स्ताहाल

अपने ख़स्ता हाल पे औरों , के धन से चिढ़ हो ।। देख बहुत अपना बूढ़ापन , यौवन से चिढ़ हो ।। और यही मन और भी दुःख देता है जब अपना , रोग असाध्य हो तो स्वस्थों के , जीवन से...Read more

मुक्तक : 182 – जिन्हें सपनों में

जिन्हें सपनों में भी ना पा सकें उन पर ही मरते हैं !! न जाने कैसी-कैसी कल्पनाएँ लोग करते हैं ? चकोरों को पता है मिल नहीं सकता उन्हें चंदा , वे फिर भी उसको निश भर तक निरंतर आह भरते हैं !! -डॉ. हीरालाल...Read more

मुक्तक : 181 – हँस के सिर आँखों पे

हँस के सिर आँखों पे ,उठायी ही क्यों जाती है ? जब बुरी है तो फ़िर ,बनायी ही क्यों जाती है ? गर है नापाक़ ये ,शराब तो फिर बतलाओ , पीयी जाती है और ,पिलायी ही क्यों जाती है...Read more