चट्टानों से दिखते हो पर हो राखड़ ।।

तुम सूरज से डरने वाले चमगादड़ ।।

बनते हो रहनुमा फ़रिश्ता और ख़ुदा ,

ऊपर प्रेमिल अंदर से मुक्का झापड़ ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *