कहने को जमाने में मेरे दोस्त हैं हज़ार ॥ 

दो चार ही निकलेंगे मगर सच्चे ग़मगुसार ॥ 

मतलब को कुछ तो गुड़ पे मगस जैसे भिनभिनाएँ 

हो जाते हैं तक़्लीफ़-ओ-मुसीबत में कुछ फरार ॥ 

डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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