कंकड़ भी मुझको दुःख के लगते हैं पहाड़ से ॥

सुख तिल समान भासते हों चाहे ताड़ से ॥ ,

आनंद उठाएँ जैसे लोग प्यार से सभी ,

तुम वैसे ही उठाओ कष्ट-पीड़ लाड़ से !!

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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